कल (13 अप्रैल, 2026) नोएडा की सड़कों पर वेतन वृद्धि और अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर हजारों फैक्ट्री कर्मचारियों का उग्र प्रदर्शन देखने को मिला.मजदूर न्यूनतम वेतन 20 हजार की मांग कर रहे हैं. वेतन और ओवरटाइम भुगतान के मुद्दे पर सेक्टर-84 और सेक्टर-57 में स्थिति गंभीर हो गई, जहां प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी की और कुछ वाहनों में आग लगा दी।बिगड़ते हालात को देखते हुए भारी पुलिस बल और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। हिंसा के आरोप में बड़ी संख्या में गिरफ्तारी की गई है। सैलरी बढ़ाने की मांग को लेकर फैक्ट्री कर्मचारी मंगलवार को भी सड़कों पर उतर आए।पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो झड़प हो गई। भीड़ ने 2–3 जगहों पर पुलिस की गाड़ियों पर पथराव किया। हालांकि पुलिस ने थोड़ी देर में ही हालात पर काबू पा लिया। प्रदर्शनकारियों को वहां से खदेड़ दिया।
मामले पर राहुल गाँधी ने एक्स पर दी प्रतिक्रिया,”कल नोएडा की सड़कों पर जो हुआ, वो इस देश के श्रमिकों की आख़िरी चीख़ थी – जिसकी हर आवाज़ को अनसुना किया गया, जो मांगते-मांगते थक गया।नोएडा में काम करने वाले एक मज़दूर की ₹12,000 महीने की तनख्वाह,₹4,000-7,000 किराया। जब तक ₹300 की सालाना बढ़ोतरी मिलती है, मकान मालिक ₹500 सालाना किराया बढ़ा देता है।तनख्वाह बढ़ने तक ये बेलगाम महंगाई ज़िंदगी का गला घोंट देती है, कर्ज़ की गहराई में डुबा देती है – यही है “विकसित भारत” का सच।एक महिला मज़दूर ने कहा – “गैस के दाम बढ़ते हैं, पर हमारी तनख्वाह नहीं।” इन लोगों ने शायद इस गैस संकट के दौरान अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए ₹5000 का भी सिलेंडर खरीदा होगा।”
राहुल गाँधी ने आगे कहा, ”यह सिर्फ़ नोएडा की बात नहीं है। और यह सिर्फ़ भारत की भी बात नहीं है। दुनियाभर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं – पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से सप्लाई चेन टूट गई है।मगर, अमेरिका के टैरिफ़ वॉर, वैश्विक महंगाई, टूटती सप्लाई चेन – इसका बोझ Modi जी के “मित्र” उद्योगपतियों पर नहीं पड़ा। इसकी सबसे बड़ी मार पड़ी है उस मज़दूर पर जो दिहाड़ी कमाता है, तभी रोज़ खाता है।वो मज़दूर, जो किसी युद्ध का हिस्सा नहीं, जिसने कोई नीति नहीं बनाई – जिसने बस काम किया। चुपचाप। बिना शिकायत। और उसके बदले अपना हक मांगने पर उन्हें मिलता क्या है? दबाव और अत्याचार।एक और ज़रूरी मुद्दा – मोदी सरकार ने 4 लेबर कोड जल्दबाज़ी में बिना संवाद नवंबर, 2025 से लागू कर, काम का समय 12 घंटे तक बढ़ा दिया।जो मज़दूर हर रोज़ 12-12 घंटे खड़े होकर काम करता है फिर भी बच्चों की स्कूल फ़ीस क़र्ज़ लेकर भरता है – क्या उसकी मांग ग़ैरवाजिब है? और जो उसका हक़ हर रोज़ मार रहा है – वो “विकास” कर रहा है?नोएडा का मज़दूर ₹20,000 माँग रहा है। यह कोई लालच नहीं – यह उसका अधिकार, उसकी जिंदगी का एकमात्र आधार है।मैं हर उस मज़दूर के साथ हूं – जो इस देश की रीढ़ है और जिसे इस सरकार ने बोझ समझ लिया है।”




