बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के चुनावी मैदान में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भाजपा-जदयू-हम-वीआईपी और महागठबंधन की राजद, कांग्रेस और वामदलों के अलावा उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP), असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन(AIMIM) और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) का गठबंधन भी चुनाव मैदान में है।खुद को ग्रैंड सेक्युलर डेमोक्रेटिक फ्रंट(GSDF) कहने वाले इस गठबंधन का वोट बैंक अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), खासकर कुशवाहा, मुस्लिम अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति है। ये वोट बैंक आरएलएसपी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और बसपा प्रमुख मायावती का बेस वोट है। इस गठबंधन की वजह से राजद, कांग्रेस और तीन वाम दलों के महागठबंधन के वोट बैंक अड़चन पैदा कर दी है, क्योंकि यह राजद के ओबीसी और अल्पसंख्यकों के समर्थन के आधार को नष्ट कर सकता है। खासकर किशनगंज, अररिया और अल्पसंख्यक बहुल सीमांचल बेल्ट और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे कैमूर के बक्सर बेल्ट में। वहीं एनडीए इस बात से अधिक आशान्वित है।उधर महागठबंधन से बाहर निकलने और तीसरे फ्रंट बनने के बाद GSDF ने चुनाव के दौरान आरएलएसपी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को सीएम चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट किया है। गठबंधन ने ओवैसी के एआईएमआईएम के साथ 243 सीटों में से अधिकांश पर अपने उम्मीदवार उतारे। ओवैसी की एआईएमआईएम 18 सीट, आरएलएसपी 104 सीटों पर और 80 सीटों पर मायावती की पार्टी मैदान में है। AIMIM को बिहार में पहली सफलता पिछले साल हुए उपचुनावों में मिली जब उसने किशनगंज विधानसभा सीट जीती। इस बार एआईएमआईएम पूरे बिहार के 18 में से सीमांचल में 13 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी ने मुख्य रूप से जोकीहाट जैसे अल्पसंख्यक बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम चेहरों को मैदान में उतारा है, जहाँ शाहनवाज़ आलम, दिवंगत केंद्रीय मंत्री मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे को अपना उम्मीदवार बनाया है। नामांकन से वंचित होने के बाद शाहनवाज़ ने राजद(RJD) से एआईएमआईएम का रुख किया।ranjana pandey



