TMC सरकार के आदिवासी विरोधी रवैए का पता तो पिछले साल ही मुझे पता चल गया था

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champai soren

झारखण्ड के पूर्व सीएम चम्पई सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को लेकर बंगाल सरकार पर निशाना साधा है. चम्पई सोरेन ने एक्स पर लिखा, ”महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी के साथ पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में हुआ व्यवहार अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और अक्षम्य है। यह केवल एक व्यक्ति अथवा पद का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, मातृशक्ति एवं आदिवासी समाज की अस्मिता का अपमान है।जब कभी भी राष्ट्रपति किसी राज्य में जाती हैं, तो प्रोटोकॉल के तहत मुख्यमंत्री अथवा किसी कैबिनेट मंत्री को वहाँ उपस्थित रहना चाहिए, लेकिन सिलीगुड़ी में यह परंपरा टूट गई। देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति के स्वागत में कोई बैनर तक नहीं लगा, कार्यक्रम स्थल जबरन बदलवाया गया एवं वहां कोई व्यवस्था नहीं की गई। इसे लापरवाही कहें अथवा जान-बूझ कर किया गया अपमानजनक कृत्य?”

चम्पई सोरेन ने एक्स पर लिखा,”पिछले साल, इसी टीएमसी सरकार ने सिलदा (झाड़ग्राम) के ओरगोंडा में आयोजित पाटा बिंदा मेला के मेरे कार्यक्रम को अनुमति देने से इनकार कर दिया था। तब मुझे इनके आदिवासी विरोधी रवैए का पता तो चल गया था, लेकिन यह शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ये लोग एक ऐसे कार्यक्रम की अनुमति देने से इनकार कर देंगे, जिसमें महामहिम राष्ट्रपति महोदया को मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होना हो।गुरु गोमके पं. रघुनाथ मुर्मू जी द्वारा रचित संथाली भाषा की ओल चिकी लिपि के 100 साल होने पर महामहिम ओडिशा, झारखंड, दिल्ली समेत कई राज्यों में विभिन्न कार्यक्रमों में भाग ले रही हैं। वैसे भी, देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठी, भारत की प्रथम नागरिक कब, कहां और किस कार्यक्रम में भाग लेंगी, यह तय करना किसी राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।”

चम्पई सोरेन ने एक्स पर लिखा,”ओल चिकी लिपि के 100 साल पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार द्वारा पं. रघुनाथ मुर्मू जी के सम्मान में सिक्का एवं डाक टिकट जारी किया गया है। वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल सरकार देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठी एक आदिवासी महिला के साथ ऐसा सलूक कर रही है, तो आम जनमानस के प्रति उसके व्यवहार को समझा जा सकता है।आदिवासी समाज यह अपमान बर्दास्त नहीं करेगा। केन्द्र सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए, पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहिए, ताकि वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं को सम्मान मिल सके।”

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