एक तरफ चौड़ी नहर है तो दूसरी और हर-भरे खेत. ये दोनों कभी खत्म होते नहीं दिखते. इसके आसपास कोई घर भी नजर नहीं आता है. इसके बीच में एक कच्ची सड़क है, जो आपको बिहार के सीमांल के अंदरूनी इलाकों में ले जाती है. अगर आप यहां रास्ता भटकते हैं तो बहुत संभव है कि आप नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंच जाएं. भरी दोपहर में 50 साल के मोहम्मद तौफीक अपने खेतों में बीच में घूम रहे थे. सूरज अभी भी गरमी बिखेर रहा था. मोटरसाइकिलें जा रही थीं, उन पर सवार लोग राष्ट्रीय जनता दल का साफा पहने हुए थे. मुसलमान और एमआईएम
पेशे से किसान तौफीक कहते हैं, ” मैं असद साहब की पार्टी को वोट दूंगा.” इसकी वजह पूछने पर वो बिना कोई देरी किए कहते हैं, ” यह असदउद्दीन ओवैसी ही हैं, जो मुसलमानों के लिए लड़ रहे हैं. यह उनकी पार्टी ही है जो बीजेपी के सीएए-एनआरसी जैसी मुसलमान विरोधी कानूनों के खिलाफ खड़ी है. आपने वह वीडियो नहीं देखा है, जिसमें वो संसद में सीएए की कॉकी फाड़ते हैं. मुसलमान अगर एमआईएम को वोट नहीं देंगे, को किसे वोट देंगे.”
तौफीक इंटरनेट का बहुत अधिक प्रयोग नहीं करते हैं. वह बहुत पढ़े-लिखे भी नहीं हैं. जिस इलाके में वो रहते हैं, वहां मीडिया से जुड़ाव शहरी इलाकों की तुलना में काफी कम है. इसके बाद भी एमआईएम के समर्थकों को यह विस्तार से पता है कि बीजेपी कैसे मुस्लीम विरोधी कानून बना रही है और कैसे हैदराबाद के सांसद ओवैसी संसद में इससे अकेले लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ते रहेंगे.
तौफीक जैस मतदाताओं की बदौलत ही एमआईएम ने सीमांचल में विधानसभा की सीटें जीतने की उम्मीद लगा रखी है. सीमांचल की सीमाएं नेपाल और बांग्लादेश से मिलती हैं. एक हफ्ते पहले तक हैदराबाद की इस पार्टी का दावा था कि वो अल्पसंख्यक समुदाय का उसे भारी समर्थन मिलेगा. यह सही भी हो सकता है.
एमआईएम की जीत का मतलब
इस इलाके में एमआईएम की बढ़त का मतलब होगा, महागठबंधन के उम्मीदवारों का कमजोर होगा. इसकी वजह से आरजेडी को जलन हो सकती है और कांग्रेस के लिए लड़ाई कठिन हो सकती है. यहां महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी यादव की प्रतिष्ठा दांव पर है. उनकी मुस्लिम मतदाताओं पर पकड़ कमजोर पड़ सकती है, जिसे आरजेडी का एक मजबूत वोट बैंक माना जाता है.
हालांकि जमीन हालात में इतनी तेजी से बदलाव आया है कि एमआईएम शायद ही उसकी भरपाई कर सके. अगर महागठबंधन का योजना सफल होती है तो ओवैसी का बिहार की मुस्लिम सीटों को जीतने का सपना टूट सकता है. बिहार में मुस्लिम वोट करीब 17 फीसदी हैं.
मुसलमानों को बिहार में कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता था. लेकिन बाद में वो राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की ओर चले गए. लेकिन जनता दल यूनाइटेड के उभार और सत्ता में बने रहने की वजह से मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा उसकी ओर चला गया.
सीमांचल के इलाकों में मुस्लिम वोट बिहार के अन्य इलाकों की तुलना में बहुत अधिक हैं. एक अनुमान के मुताबिक सीमांचल की लोकसभा सीट किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया में मुस्लिम मतदाता क्रमश: 70, 44, 42 और 38 फीसदी हैं.
सीमांचल के इस इलाके में विधानसभा की 25 सीटें हैं. यहां की जोकीहाट जैसी सीट को आरजेडी नेता तस्लीमुद्दीन का गढ़ माना जाता है. वहां मुसलमानों के वोट करीब 80 फीसदी तक हैं. बिहार के अन्य इलाकों से इतर यहां के अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाता किसी राजनीतिक दल के भविष्य को बना या बिगाड़ सकते हैं.
एमआईएम का गठबंधन
एमआईएम उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में बने ग्रांड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट (जीएसडीएफ) का हिस्सा है. वह 24 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसमें से 10 सीटें सीमांचल में ही हैं. औवेसी ने इस इलाके में जबरदस्त चुनाव प्रचार किया है. वो इसी इलाके में डेरा डाले हुए हैं.
एमआईएम को यह पता है कि अगर उसे बिहार में अपने पांव पसारने हैं तो 2020 का विधानसभा चुनाव और सीमांचल का इलाका उसके मुफीद है. चुनाव प्रचार के दौरान ओवैसी बीजेपी और भगवा ब्रिगेड पर जबरदस्त हमला करते हैं. वह वोटरों को नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी की याद दिलाना नहीं भूलते हैं. इसका कारण यह है कि सीएए और एनआरसी के विरोध में सबसे बड़ा प्रदर्शन इसी इलाके में आयोजित किया गया था. इन मुद्दों पर मुसलमान युवा अभी भी व्यग्र हैं.
अपने भाषणों के दौरान ओवैली महागठबंधन पर जमकर हमला बोलते हैं. वो कहते हैं कि केवल महागठबंधन की वजह से ही एनडीए सत्ता में वापस लौटेगी. ओवैसी यह कहकर महागठबंधन का मजाक उड़ाते हैं कि बिहार में बीजेपी को रोकने लायक वोट उनके पास नहीं हैं.
हफ्ते-10 दिन पहले तय हैदराबाद का यह सांसद अपने भाषणों में अल्पसंख्यक समुदाय की बात प्रमुखता से उठाते थे. लेकिन अंतिम दौर के प्रचार के बाद हालात बदल गए हैं.
भगवानपुर पंचायत में 5 हजार से अधिक वोट हैं. इसमें से अधिकांश मुसलमान हैं. यहां चाय की एक दुकान पर मेरी मुलाकात मोहम्मद सईद से हुई. उन्होंने यह बताया कि कैसे और क्यों अंतिम समय में हालात बदल गए हैं.
तेजस्वी की राजनीति
करीब 70 साल के हो चुके सईद कहते हैं, ” सत्ता बदलना है. तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाना है.” इस चुनाव में ओवैसी के प्रभाव के सवाल पर वहां मौजूद लोग कहते हैं कि ओवैसी कोई मुद्दा नहीं हैं. लोग कहते हैं कि जोकीहाट में ओवैसी की पार्टी को जो वोट मिलेगा, वह केवल इसलिए कि उन्होंने तस्लिमुद्दीन साहब के बेटे को टिकट दिया है. यह वोट ओवैसी की पार्टी के लिए नहीं है.
जोकीहाट विधानसभा सीट से आरजेडी और एमआईएम ने तस्लीमद्दीन के बेटों को टिकट दिया है. और लगता है कि इससे यहां के कई मुसलमान मतदाता इससे नाराज हैं. 42 साल के अजीम कुछ बुजुर्गों के साथ बैठे हुए हैं. एमआईएम से नाराजगी जताते हुए वो कहते हैं, ” अगर हम सीमांचल से एमआईएम के कुछ उम्मीदवारों को जिता भी दें तो क्या कर पाने में सक्षम होंगे. क्या वो सरकार बना पाएंगे. नहीं. क्या वो बीजेपी को रोक पाएंगे. नहीं. और इस बात की क्या गारंटी है कि चुनाव जीतने के बाद वो पाला नहीं बदलेंगे.”
यहां तक कि इस पंचायत के युवा मतदाता भी ओवैसी से नाराज हैं. 24 साल के मोहम्मद वाहिद कहते हैं, ” हम नहीं जानते हैं कि ओवैसी कौन है. हमारे नेता तेजस्वी यादव हैं. और हम चाहते हैं कि वो जीतें.” वहीं उनके पास ही खड़े हैं 27 साल के मोहम्मद फीरोज आलम. पिछले कुछ सालों से वो वो बिहार सरकार के स्कूल में उर्दू टीचर के रूप में अपनी बहाली का इंतजार रहे हैं. वो कहते हैं, ” तेजस्वी युवा नेता हैं. उन्होंने नौकरियों का वादा किया है. हम उनको वोट देंगे. किसी और को वोट देने का सवाल ही नहीं है.”
यहां के मतदाताओं में लालू प्रसाद यादव को लेकर सम्मान और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर गुस्सा नजर आता है.
65 साल के नबी हसन कहते हैं, ” नीतीश ने बिहार में विकास तो किया है. लेकिन उन्होंने हमारा भरोसा भी तोड़ा है. उन्होंने हमारे जनादेश को बेच दिया. बीजेपी से हाथ मिलाकर उन्होंने मुसलमानों को पीठ पीछे छूरा घोंपा है. बीजेपी एनआरसी लाकर मुसलमानों को देश से बाहर खदेड़ना चाहती है.” गेहूं और मक्के की खेती करने वाले हसन इस संभावना से इनकार करते हैं कि उनके इलाके का वोट महागठबंधन को छोड़कर किसी और पार्टी को जाएगा.
हिंदू-मुस्लिम एकता
यहां से कुछ दूरी पर डुमरिया चौक है. वहां पर मेरी मुलाकात कुछ मुसलमान सरकारी अध्यपकों से हुई. नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर 40 साल के एक अध्यापक ने बताया, ” ओवैसी साहब मुसलमान के नाम पर वोट मांग रहे हैं. वो मतदाताओं को हिंदू-
मुसलमान में बांटना चाहते हैं. मान लिजिए जिन सीटों पर हमारी अबादी अधिक है, उन सीटों पर हम उनके इस सांप्रदायिक एजेंडे का समर्थन करते हैं. लेकिन उन सीटों पर क्या होगा, जहां हमारे हिंदू भाइयों की आबादी अधिक है. केवल कुछ विधानसभा सीटें जीतने के लिए आप सामाजिक ताने-बाने का खराब नहीं कर सकते हैं.”
हमारी इस बातचीत को मोहम्मद आलमी बड़ी तल्लीनता से सुन रहे हैं. वो बीच में हमें रोकते हुए कहते हैं, ” बीजेपी और एमआईएम में कोई अंतर नहीं है. ऐसा क्यों है कि वो केवल उन्हीं सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं, जहां मुसलमानों की आबादी ज्यादा है. क्या यह पता नहीं है कि चुनावों में मुस्लिम वोटों में विभाजन का फायदा किसे मिलेगा.”
अध्यापकों का यह समूह इस बात को मानता है कि कुछ हफ्ते पहले तक एमआईएम इस इलाके में बहुत अधिक लोकप्रिय था, खासकर युवाओं में, जो कि
मदरसे से जुड़े हुए हैं. इन लोगों का कहना था कि एमआईएम का समर्थन करने वालों में से अधिकांश तो अभी तक वोटर भी नहीं बने हैं. इन लोगों को उम्मीद है कि मतदान के दिन तक बचे हुए लोग भी आरजेडी-कांग्रेस के खाते में लौट आएंगे. यहां यह बात उल्लेखनीय है कि उम्मीदवारों के चयन में हुआ विवाद और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती का उत्तर प्रदेश में बीजेपी को समर्थन करने को लेकर दिया गए बयान ने बाजी पलट दी है. मायावती का बिहार के चुनाव में एमआईएम के साथ गठबंधन है. उत्तर प्रदेश के विधान परिषद के चुनावों में बीजेपी को समर्थन को लेकर दिया गया उनका बयान, सोशल मीडिया के जरिए जंगल में आग की तरह फैला. उनके इस बयान ने एमआईएम के समर्थन को घटाने का काम किया है.
बीएसपी, एमआईएम और बीजेपी के रिश्तों को जोड़ते हुए डुमरिया के मोहम्मद असगर कहते हैं, ” सीमांचल से एमआईएम सा पतंग ऐसा कटेगा कि सीधे ओवैसी के हैदराबाद जाकर रुकेगा.”
कुछ ऐसी ही भावना कोचाधामन विधानसभा सीट के मतदाताओं में भी है, जहां एमआईएम की स्थिति मजबूत बताई जा रही है. किशनगंज में भी हालात बहुत अलग नहीं हैं. एमआईएम के कमर उल हुदा ने 2019 में किशनगंज का उपचुनाव जीता था. हालांकि 2020 में उनके चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में हालात उनके विपरीत होने लगे.
करीब 60 साल के हो चुके मोहम्मद कामरान कहते हैं, ” साल 2019 में एमआईएम इसलिए जीती, क्योंकि वह उपचुनाव था. इससे सरकार बनाने में कोई असर नहीं पड़ने वाला था. लेकिन 2020 के चुनाव में हर सीट का महत्व है. और सरकार के गठन में एमआईएम की कोई भूमिका नहीं होगी.”’
राहुल गांधी का संदेश
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले दौर के मतदान में माना गया कि मुसलमानों के एक वर्ग ने धार्मिक अल्पसंख्यक की बजाय जाति के आधार पर वोट किया है. इसमें युवा मतदाताओं की संख्या अधिक थी. सीमांचल में एमआईएम के आक्रामक चुनाव प्रचार ने मतदाताओं को भ्रम में डाल दिया है.
इस चुनाव में महागठबंधन का बहुत कुछ दांव पर है. अपनी चुनावी नैया को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि आरजेडी-कांग्रेस के गठबंधन को सीमांचल की मुसलमान बहुल सीटों पर अपने पिछले प्रदर्शन को
दोहराना होगा. हालांकि इन इलाकों में ओवैसी की मौजूदगी ने महागठबंधन के उम्मीदवारों के लिए हालात को कठिन बनाया है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने किशनगंज की अपनी जनसभा में मतदाताओं में फैले भ्रम को दूर किया था. खासकर किशनगंज में आने वाली 6 विधानसभा सीटों के मतदाताओं के लिए. राहुल ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ राष्ट्री स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर हमला बोला और मुस्लिम वोटरों के साथ विश्वासघात के लिए नीतीश कुमार की आलोचना की थी. लेकिन उनके भाषण का मुख्य आकर्षण एमआईएम पर किया गया हमला था. उन्होंने उन्हीं भावनाओं को हवा दी, जो यहां के मतदाताओं में पहले से ही हैं.
राहुल गांधी ने ओवैसी और एमआईएम का नाम लिए बिना, उन्हें बीजेपी का बी टीम बताया. उन्होंने बताया कि मतदाताओं को एनडीए या महागठबंधन के अलावा क्यों किसी और गठबंधन को वोट नहीं देना चाहिए. राहुल गांधी ने कहा, ” बिहार में सरकार या तो महागठबंधन बनाएगी या एनडीए. ऐसे में किसी और पार्टी को वोट देने का क्या मतलब है. केवल उन्हीं को वोट दीजिए जो सरकार बनाएं. आप महागठबंधन के उम्मीदवार को वोट दीजिए, क्योंकि हम सरकार बनाने जा रहे हैं.’ranjana



