चंपई सोरेन: सेस के कारण झारखंड का कोयला पड़ोसी राज्यों से महंगा,झारखंड की जनता सीधी-सादी,राजनैतिक दांव-पेचों को नहीं समझती

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Champai soren

रांची: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने राज्य सरकार की खनिज नीति और कोयला-लौह अयस्क पर लगाए जा रहे सेस को लेकर हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में मनमाने तरीके से लगाए जा रहे सेस के कारण झारखंड का कोयला पड़ोसी राज्यों की तुलना में महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर खनन कंपनियों, रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।चंपई सोरेन ने थर्मल कोयले के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि G11 ग्रेड का कोयला झारखंड में करीब ₹2,458 प्रति टन, जबकि पश्चिम बंगाल में करीब ₹1,741 और ओडिशा में करीब ₹1,708 प्रति टन है। उनके मुताबिक, इस अंतर के कारण ग्राहक झारखंड की बजाय पड़ोसी राज्यों से कोयला खरीदना पसंद करेंगे, जिससे प्रति टन लगभग ₹700-750 की बचत हो सकती है।

‘अंतर कंपनियों की कीमत में नहीं, टैक्स और सेस में है’

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जब कोयला खनन में लगी कंपनियों की मूल कीमतें लगभग समान हैं, तो झारखंड में कीमत अधिक होने का मुख्य कारण टैक्स और सेस है। उन्होंने राज्य सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि अत्यधिक सेस के कारण वैध खनन कारोबार प्रभावित हो रहा है और इससे अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलने की आशंका पैदा होती है।चंपई सोरेन ने आरोप लगाया कि अवैध कारोबार बढ़ने की स्थिति में राज्य को रॉयल्टी, DMFT, NMET और GST जैसे वैध राजस्व का नुकसान हो सकता है। उन्होंने इसे राज्य के हितों के खिलाफ बताया और कहा कि झारखंड को अवैध कारोबार का केंद्र बनाने की किसी भी कोशिश का विरोध किया जाएगा।

MMDR कानून को लेकर भी सरकार पर निशाना

उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा MMDR संशोधन कानून के जरिए अवैध खनन और कारोबार पर रोक लगाने के प्रयास का भी उल्लेख किया। चंपई सोरेन का आरोप है कि इस मुद्दे को झारखंड के अधिकारों पर हमला बताकर आदिवासी और मूलवासी समाज को भ्रमित किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि झारखंड की जनता के भोलेपन का राजनीतिक लाभ नहीं उठाया जाना चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि यदि जनता के सामने सरकार की कथित नीतियों की वास्तविकता सामने आती है तो इसके गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।

कांग्रेस पर भी उठाए सवाल

चंपई सोरेन ने कांग्रेस पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि कांग्रेस कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में सत्ता में है, लेकिन वहां इस तरह के टैक्स नहीं लगाए जाते। उन्होंने सवाल किया कि यदि केंद्र में विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस के सांसदों ने संसद में संबंधित कानून का विरोध नहीं किया, तो झारखंड में राज्य सरकार इस मुद्दे पर अलग रुख क्यों अपना रही है।उन्होंने ‘One Nation, One Tax’ के तहत टैक्स व्यवस्था को सरल बनाने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों का हवाला देते हुए राज्य सरकार की नीति को अनुचित बताया। साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए दावा किया कि संसद के पास इस तरह के सेस को कम करने या हटाने का अधिकार है।

‘हजारों करोड़ सेस के बावजूद गांवों के लिए क्या किया?’

पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार से सवाल किया कि पिछले दो वर्षों में हजारों करोड़ रुपये सेस के रूप में वसूल किए जाने के बावजूद क्या खनन प्रभावित गांवों को प्रदूषण और विस्थापन की समस्याओं से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार किया गया है।उन्होंने कहा कि यदि इतनी बड़ी राशि का प्रभावी इस्तेमाल किया जाता तो सैकड़ों ‘स्मार्ट विलेज’ विकसित किए जा सकते थे। चंपई सोरेन ने आरोप लगाया कि सरकार की प्राथमिकता विकास के बजाय राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व वसूलना बन गई है।

‘नई खदानें शुरू कर राज्य कमा सकता है हजारों करोड़’

चंपई सोरेन ने राज्य सरकार को ओडिशा का उदाहरण देते हुए नई खदानें शुरू करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि रॉयल्टी और नीलामी प्रीमियम के जरिए राज्य हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व अर्जित कर सकता है।उनका दावा है कि केंद्र सरकार कई खदानों को पहले ही आवश्यक मंजूरी दे चुकी है, इसके बावजूद राज्य सरकार उन्हें शुरू करने में देरी कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि राज्य को राजस्व की जरूरत है तो नई खदानों को शुरू करने की दिशा में तेजी क्यों नहीं दिखाई जा रही है।

‘नीति का नुकसान झारखंडियों को ही उठाना पड़ेगा’

पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया कि राज्य सरकार की मौजूदा नीति के कारण स्थानीय खनन कंपनियां भारी नुकसान में हैं और कई खदानें बंद हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि इससे हजारों लोगों के रोजगार पर असर पड़ रहा है और अंततः इसका खामियाजा झारखंड के लोगों को भुगतना पड़ेगा।चंपई सोरेन ने कहा कि झारखंड आंदोलन के दौरान आदिवासियों, मूलवासियों और आम लोगों के जीवन में बदलाव लाने का सपना देखा गया था। उनके मुताबिक, ऐसे कर और सेस, जो वैध खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों को महंगा बनाते हैं, राज्य के विकास में बाधा बन सकते हैं।उन्होंने अंत में कहा कि झारखंड को अवैध धंधों का अड्डा बनाने की किसी भी कोशिश का सड़क से लेकर सदन तक विरोध किया जाएगा और सरकार की नीतियों को राज्य की जनता के सामने उजागर किया जाएगा।

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