वैश्विक महामारी कोरोना वायरस का असर वर्ष के शुरुआत से लेकर अभी तक देखा जा रहा है. नया साल आने की दलहीज पर है लेकिन कोरोना अभी भी नहीं जाने की जिद पर अड़ा है. झारखंड में कोरोना ने कई लोगों की जिंदगी बदल डाली. एक ओर जहां दफ्तर से लेकर स्कूल-कॉलेज के काम में बदलाव आया, वहीं दूसरी ओर कोरोना के नाम पर बेरोजगारी भी बढ़ती रही.
कोराना का वायरस लोगों के शरीर के साथ-साथ नौकरियों में आता दिखा. कोरोना से जीवनशैली में कई बदलाव हुए. इसका असर पूजा-पाठ में भी देखने को मिलता रहा. इसी क्रम में पूर्वी भारत का सबसे बड़े पर्व नवरात्र के दौरान भक्तों को मंदिरों में माता के प्रसाद से भी दूर रहना पड़ा. पंडालों में 50 से अधिक लोगों के जाने पर पाबंदी लगा दी गयी. पूरे साल कोई भी धार्मिक जुलूस नहीं निकल पाया. मंदिरों को अभी खोला जा रहा है लेकिन यहां भी 50 लोगों से अधिक की इंट्री बंद है.
कोरोना की छाप हर धर्म पर दिखी. शायद यही कारण रहा कि जो परंपरा हजारों वर्षों से बदल नहीं सकी उसे कोरोना ने महज नौ माह में बदल दिया. अभी दिसंबर तक 1.15 लाख कोरोना पॉजिटिव मरीज मिल चुके हैं. अब भी लोग इसके डर से इस तरह भयभीत हैं कि वे भी सभी पारंपरिक नियमों को छोड़ अपनी जान बचाने को प्राथमिकता दे रहे हैं और कोविड गाइडलाइन का पालन करते दिख रहे हैं.
कोरोना काल के कारण आज सभी मास्क, सैनिटाइजर, सोशल डिस्टेंस के साथ जी रहे हैं, जो शायद अगले कई वर्षों तक जीवन का अहम हिस्सा बना रहेगा.
करीब सात लाख प्रवासी मजूदर लौटे झारखंड, सरकार को मिला आंकड़ा–
कोरोना काल में राज्य में प्रवासी मजदूरों की संख्या में बेहताशा वृद्धि हुई. आखिरकार सरकार को इसी काल में पता चल पाया कि करीब सात लाख प्रवासी मजदूर अपने राज्य के हैं. मजदूरों की संख्या एकजुट करने के लिए सरकार के हर विभाग ने गणना शुरू कर दी.
आखिरकार करीब सात लाख प्रवासी मजदूरों का डाटा तैयार हुआ. शुरुआत में सभी राज्यों से प्रवासी मजदूरों को वापस लौटने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने को कहा गया, जिसके बाद हजार, दो हजार व पांच हजार की संख्या में मजदूर लौटने लगे. कई मजदूरों ने तो हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय कर डाली.
सरकार अब ऐसे प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने की कवायद भी शुरू कर दी है ताकि उन्हें बाहर काम की तलाश में दोबारा नहीं जाना पड़े. लेकिन इसके बाद भी श्रम विभाग ने ऐसे जाने वाले श्रमिकों को भरोसा दिलाया गया कि वे जिस कंपनी में काम करने जायेंगे उन्हें वहां सरकार द्वारा सुविधा मुहैया करायी जायेगी. साथ ही उस कंपनी से तालमेल बिठाया जायेगा.
अस्पतालों में कम होते गये मरीज, ऑनलाइन इलाज की हुई शुरुआत–
कोरोना वायरस का खौफ इतना रहा कि अस्पतालों में भर्ती मरीज तक अस्पताल छोड़ जाने लगे. रिम्स जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में जहां मरीज बेड से भी अधिक करीब 1700 के आसपास इलाजरत होते थे, उनकी संख्या इस दौरान 50 तक भी नहीं थी.
बीच माह में बढ़ते संक्रमितों की वजह से ओपीडी सेवाएं बंद कर दी गयीं, फिर शुरू हुई एक नयी ऑनलाइन सेवा. शायद जो डॉक्टर फोन पर इलाज नहीं करने की सलाह देते थे, वहीं इस कोरोना काल में ऑनलाइन मरीजों को सलाह देते रहे. यहां तक की उन्हें दवाएं लेने की जानकारी भी ऑनलाइन देते रहे.
अस्पतालों में सन्नाटा छाने लगा और घरों से ही लोग डॉक्टरी सलाह लेने लगे. इस बीच कई मोबाइल ऐप लॉन्च हुए जिससे लोगों की जीवनशैली बदल गयी. जो मोबाइल से दूरी बनाते थे वो भी मोबाइल से दोस्ती करने लगे.ranjana



