झारखंड का आदिवासी महाकुंभ यानी राजमहल में आयोजित राजकीय माघी पूर्णिमा मेला के पहले दिन से ही श्रद्धालुओं का गंगा स्नान एवं पूजन के लिए गंगा घाट पहुंचे.लाखों की संख्या में आदिवासी और गैर-आदिवासी श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई. माघ मास की पूर्णिमा पर झारखंड के एकमात्र राजमहल के उत्तरवाहिनी गंगा तट पर लगने वाला माघी मेला कई मामले में खास है. यह मेला आदिवासी एवं गैर आदिवासी समाज के सांझी संस्कृति का एक अद्भुत मिसाल पेश करता है.गंगा तट पर आदिवासियों का मिलान इतने बड़े संख्या में राजमहल में ही होता है. इसलिए इसे आदिवासियों का महाकुंभ भी कहा जाता है. यहां आदिवासी समाज के श्रद्धालु अपने-अपने धर्मगुरुओं के साथ अनुशासनिक तरीके से अपने अखाड़ा से निकलकर गंगा स्नान व गंगा पूजन एवं घंटों सूर्योपासना के उपरांत लोटा में जल लेकर भीगे वस्त्र में ही अखाड़ा पहुंचते हैं. जहां ईष्ट देवता और अन्य देवी देवताओं की आराधना की जाती है.अखाड़ा में साफाहोड़ आदिवासी तुलसी का पेड़ एवं त्रिशूल( ऊं ) के उच्चारण के साथ पूजा अर्चना करते हैं. वहीं पूजन के उपरांत लोटा के जल भर कर श्रद्धालु अपने-अपने घर जाते हैं. गुरु बाबा पूजन प्रणाली के दौरान बेंत की लकड़ी का विशेष उपयोग करते हैं.बाबा अखाड़ा में अपने शिष्यों के शारीरिक, आर्थिक व मानसिक कष्टों का निवारण करते हैं. गुरु शिष्य की परंपरा का ऐसा अनोखा एवं प्राचीनतम उदाहरण शायद ही कहीं देखने को मिले.आधुनिक चकाचौंध से दूर साफाहोड़ एवं विदिन समाज के अनुयायी मांस मदिरा का सेवन करना तो दूर, लहसुन प्याज तक नहीं खाते हैं. वे सादा भोजन सादगी पूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं. मां गंगा के प्रति उनकी सच्ची श्रद्धा ही है कि यह लोग गंगा स्नान में शैंपू साबुन या तेल का उपयोग नहीं करते हैं. मान्यता है कि माघी पूर्णिमा में गंगा स्नान से पापों से मुक्ति मिलती है.विदिन समाज के द्वारा सबसे बड़ा एक अखाड़ा बनाया जाता है, जिसमें झारखंड सहित पश्चिम बंगाल बिहार एवं नेपाल के अनुयायी पहुंचते हैं. धर्मगुरु अभिराम मरांडी ने बताया कि विदिन समाज की ओर से गंगा स्नान के उपरांत लोटा में जल लेकर मांझी थान व जाहेर थान में जाकर देवी देवताओं पर जलाभिषेक कर पूजा अर्चना की जाती है. मांझी थान में मरांग बुरु, ताला कुल्ही, मांझी हडाम व मांझी बुढ़ी तथा जाहेर थान में जाहेर एरा, गोसाई एरा, मोडेकू तुरुईक, पिल्चू हडाम , पिल्चू बुढ़ी, मरांग बुरु की पूजा अर्चना कर जलाभिषेक किया जाता है.



