झारखंड के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो खुद सरकारी स्कूलों की पढ़ाई से संतुष्ट नहीं हैं। झारखंड जिला परियोजना परिषद की बुधवार को हुई बैठक में उनका गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने कहा, ‘सरकार हर बच्चे पर सालाना 22 हजार रुपए खर्च करती है, लेकिन अब तक शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त नहीं हो पाई। अगर शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई तो राज्य के करीब 42 हजार स्कूलों को निजी हाथों में दे दिया जाएगा।’ दरअसल, चालू वित्तीय वर्ष के 43 दिन बचे हैं, लेकिन शिक्षा विभाग 450 करोड़ रुपए खर्च नहीं कर पाया है। ये पैसे छात्रों के बौद्धिक कार्यकलापों और शारीरिक विकास मद में खर्च होने थे। अब इन पैसों को सरेंडर करने की नौबत आ गई है। बैठक में मंत्री ने जिला शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधीक्षक से पैसे खर्च न होने का कारण पूछा, लेकिन किसी ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। इस पर मंत्री ने एक महीने में पैसे खर्च करने और शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने का अल्टीमेटम दिया। कहा कि ऐसा नहीं हुआ तो जिम्मेदार अफसर सस्पेंड होंगे। बैठक में शिक्षा सचिव राजेश कुमार शर्मा ने बताया, ‘सरकारी स्कूलों की व्यवस्था तभी सुधरेगी, जब शिक्षकों की उपस्थिति शत प्रतिशत होगी। इसके लिए जिला शिक्षा अधिकारियों और प्रखंड शिक्षा अधिकारियों को मॉनिटरिंग करनी होगी। वे BRP और CRP को आदेश जारी करें कि वह तीन स्कूलों में जाकर शिक्षकों की उपस्थिति की जांच करें। इससे हालात बेहतर होंगे।’शिक्षा मंत्री ने बोकारो, हजारीबाग, रामगढ़, पलामू, बरही, चाईबासा और लातेहार के जिला शिक्षा पदाधिकारियों को भी फटकार लगाई। उन्होंने कहा, ‘सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता काफी निम्न है। 22 सालों में भी इसमें सुधार नहीं हुआ। ऐसा इच्छाशक्ति की कमी के कारण हुआ है। जो शिक्षक सरकारी नौकरी से रिजेक्ट हो जाते हैं, वैसे शिक्षक निजी शिक्षक कहलाते हैं। फिर भी अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी की जगह निजी स्कूलों में भेजने को प्राथमिकता देते हैं। हमें यह मानसिकता बदलनी होगी। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ध्यान देना होगा। इसके लिए सरकार हर कदम उठाने को तैयार है।’



