महेंद्र कपूर : जिनकी आवाज सुनकर खुद मोहम्मद रफी रह गए थे हैरान

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Mahendra Kapoor‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ , ‘है रीत जहां की प्रीत सदा…’ जैसे देशभक्ति के गीत आज भी जहां बजते हैं, वहां हर किसी की जुबान पर गायक महेंद्र कपूर का जिक्र जरूर आता है। महेंद्र कपूर ने अपनी पहचान उस समय बनाई जब फिल्म इंडस्ट्री में मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार और हेमंत कुमार जैसे आवाज के जादूगर अपने मुकाम पर थे। महेंद्र कपूर ने लोगों पर अपनी आवाज का ऐसा जादू बिखेरा कि लोग उनकी तुलना मोहम्मद रफी से करने लगे थे। 27 सितंबर 2008 को महेंद्र कपूर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। आइए उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें।महेंद्र कपूर का जन्म 09 जनवरी 1934 को अमृतसर में हुआ था। बचपन से ही गाने के शौक ने उन्हें कम उम्र में ही मुंबई पहुंचा दिया। साल 1953 में आई फिल्म ‘मदमस्त’ के साहिर लुधियानवी के गीत ‘आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए नाशाद आया’ से उन्होंने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। साल 1958 में वी शांताराम की फिल्म नवरंग में सी रामचंद्र जैसे संगीतकार के निर्देशन में ‘आधा है चंद्रमा रात आधी…’ गीत ने उन्हें इंडस्ट्री में एक नई पहचान दिलाई महेंद्र कपूर बचपन से ही मोहम्मद रफी के गाने सुनकर बड़े हुए। वह रफी साहब को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते थे। एक दौर वो भी आया जब लोग खुद मोहम्मद रफी से उनकी तुलना भी करने लगे थे। महेंद्र कपूर ने पंडित हसनलाल, पंडित जगन्नाथ बुआ, उस्ताद नियाज अहमद खान, उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित तुलसीदास शर्मा जैसे जाने-माने शास्त्रीय गायकों से शास्त्रीय संगीत सीखा था।महेंद्र कपूर के यादगार गीतों में गुमराह फिल्म का चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों., हमराज का नीले गगन के तले धरती का प्यार पले., किसी पत्थर की मूरत से., तुम अगर साथ देने का वादा करो. जैसे कई गाने शामिल हैं, लेकिन देशभक्ति गीत और उनकी आवाज जैसे एक-दूसरे के पूरक थे। महेन्द्र कपूर ने बीआर चोपड़ा की धूल का फूल, हमराज, गुमराह, वक्त, धुंध जैसी फिल्मों को अपनी आवाज दी। इसके अलावा उनकी आवाज से सजा महाभारत का शीर्षक गीत अथ श्रीमहाभारत कथा… लोगों के जेहन में आज भी ताजा है।हर कलाकार की अपनी शैली और अपना व्यक्तित्व होता है, जिसकी तुलना करना ठीक नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसा दौर आया जब  रफी साहब और महेंद्र कपूर की तुलना की जाने लगी। महेंद्र कपूर ने हमेशा अपने को लो प्रोफाइल रखा और वह अकसर कहते थे कि उनकी आवाज और रफी साहब की आवाज मिलती-जुलती है महेंद्र कपूर को 1963 में “गुमराह” फिल्म के गीत चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं.. के लिए सर्वश्रेष्ट पार्श्वगायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। बाद में एक बार फिर 1967 में “हमराज” फिल्म के नीले गगन के तले.. के लिए भी उन्हें पार्श्वगायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उनके जीवन का तीसरा फिल्मफेयर पुरस्कार “रोटी कपड़ा और मकान” के नहीं-नहीं.. और नहीं के लिए 1974 में मिला। उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया था।ranjana pandey