झारखंड के साथ ही अन्याय क्यूँ?कर्नाटक में भाजपा सरकार इसलिए गवर्नर को आरक्षण बढाने में दिक्कत नहीं

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राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने राज्य में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग वाले विधेयक को वापस कर दिया है. बता दें कि यह विधेयक अन्य पिछड़ा वर्ग कोटे को 14% से बढ़ाकर 27% और अनुसूचित जनजाति के कोटे को 26% से बढ़ाकर 28% और अनुसूचित जाति को 10% से 12% करने का प्रयास करता है. ऐसे में अगर यह बिल पारित होता है तो राज्य में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण को शामिल करने के साथ सरकार की नौकरियों में कुल आरक्षण 77 प्रतिशत हो जाएगा.इस मामले में अधिक जानकारी देते हुए राज्यपाल के कार्यालय के अधिकारी ने कहा कि यह बिल भारत के अटॉर्नी जनरल से कानूनी राय के आधार पर लौटाया गया है. साथ ही उन्होंने कहा कि झारखंड के पिछले राज्यपाल रमेश बैस ने इस बिल को अटॉर्नी जनरल को भेजा था. जिन्होंने कहा है कि बिल आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ध्यान में नहीं रखा गया है. ऐसे में उस राय को ध्यान में रखते बिल को समीक्षा के लिए पिछले महीने सरकार के पास वापस भेज दिया गया था. जानकारी हो कि यह बिल नवंबर महीने में पारित किया गया था.
वही कर्नाटक विधानसभा के लिए 10 मई को मतदान होगा. चुनावों के नजदीक आता देख बीजेपी ने कर्नाटक में सांप्रदायिक मुद्दों और हिंदुत्व के एजेंडे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, और सबसे पुराने एजेंडा “जातिगत पहचान” पर अपना पूरा ध्यान दे रही है. कुछ हफ्ते पहले ही कर्नाटक में आरक्षण के आंकड़ों में बदलाव किया गया था. कर्नाटक एक ऐसा राज्य है जहां लगभग 95 प्रतिशत जातियां किसी न किसी रूप में आरक्षण का फायदा उठाती आयी हैं.2021 में भारतीय जनता पार्टी ने बसवराज बोम्मई को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया था. तब पार्टी जाति से परे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मामले को भुनाने में लगी थी. बसवराज बोम्मई ने संघ परिवार के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल करते हुए हिजाब, हलाल और हनुमान मुद्दे को खूब उछाला था.अब पार्टी ने पूरी तरह से अपना रुख आरक्षण की राजनीति पर कर लिया है. बदलाव की इस कवायद में सबसे जरूरी पहल पिछड़े वर्ग के कोटे के तहत मुसलमानों के लिए 4% आरक्षण को स्थानांतरित करना था. 1995 में जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी देवगौड़ा ने भी इसी कवायद पर काम किया था. उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण दिया था.बीजेपी के ताजा फैसले में मुसलमानों को दिए जाने वाला 4 प्रतिशत आरक्षण खत्म कर दिया गया है. कर्नाटक कैबिनेट के फैसले के बाद ओबीसी रिजर्वेशन का वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों का कोटा बढ़ गया है. वोक्कालिगा को चार प्रतिशत
तो लिंगायत को पांच प्रतिशत ओबीसी आरक्षण कोटा में निर्धारित था. अब दो-दो प्रतिशत बढ़ने के बाद वोक्कालिगा समुदाय का कोटा छह प्रतिशत तो लिंगायत समुदाय को सात प्रतिशत हो जाएगा. मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने बताया कि कैबिनेट के फैसले के बाद वोक्कालिगा को क्रमशः 2 (सी) और 2 (डी) श्रेणी के तहत 6 प्रतिशत और लिंगायत को 7 प्रतिशत मिलेगा.
जानकारों के मुताबिक चुनाव से पहले उठाया गया ये 2 प्रतिशत अतिरिक्त आवंटन का फैसला राज्य को दो बड़े समुदायों को सामाजिक न्याय दिलाने से
कहीं ज्यादा इन समुदायों को राजनीतिक रूप से खरीदने जैसा है.बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी की अधिकतम आरक्षण सीमा तय कर रखी है, लेकिन कर्नाटक में फिलहाल करीब 56 फीसदी आरक्षण मिलता आया है. बोम्मई सरकार के एससी और एसटी समुदाय के आरक्षण के दायरे को बढ़ाने के बाद आरक्षण का मुद्दा पहले से ही कर्नाटक उच्च न्यायालय में विचाराधीन था.
पहले कर्नाटक में कर्नाटक में 50 फीसदी आरक्षण था. अनुसूचित जातियों के लिए 15 फीसदी, एसटी के लिए 3 फीसदी और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 32 फीसदी. ओबीसी के 32 फीसदी आरक्षण को कई कैटेगरी में बंटा हुआ है- पिछड़ा वर्ग को वन श्रेणी में 4 फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग को ए-2 कैटेगरी में 15 फीसदी, मुसलमानों को बी-2 के तहत 4 फीसदी आरक्षण मिलता आया है.
विपक्ष और दूसरी पार्टियों ने भी इस आरक्षण की उतनी बगावत नहीं की. कोई विरोध प्रदर्शन भी नहीं हुआ. पार्टियों ने नाममात्र का शोर मचाया. सीधे लफ्जों में कहें तो कहीं न कहीं इन सभी पार्टियों को दो शक्तिशाली समुदायों से डर है, इन्हें ये लगता है कि आरक्षण के खिलाफ बोलना राजनीतिक रूप से पार्टियों को अंधेरे में डाल देगा. ये पार्टियां भी इस आरक्षण से अपने-अपने काल्पनिक फायदे की कल्पना करने लगी हैं.
सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. कर्नाटक विधानसभा के शीतकालीन सत्र में बीजेपी सरकार ने अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के आरक्षण से जुड़ा एक विधेयक पेश किया, जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. इस बिल के तहत SC/ST के आरक्षण में 2 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है.
कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोतने राज्य में अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों(एसटी) के लिए आरक्षण बढ़ाने वाले अध्यादेश को रविवार को अपनीमंजूरी दे दी। अध्यादेश मंजूर होने के साथ ही अनुसूचित जातियों केलिए आरक्षण मौजूदा 15 फीसदी से बढ़कर 17 प्रतिशत औरअनुसूचित जनजातियों के लिए मौजूदा 3 फीसदी से बढ़कर 7हो जाएगा।यह अध्यादेश जस्टिस नागमोहन दास समिति की रिपोर्ट के अनुरूप है। राज्य मंत्रिमंडल ने कुछ दिन पहले अध्यादेश को मंजूरी दी थी। राज्यपाल ने रविवार को इसे मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अध्यादेश को कर्नाटक विधानमंडल के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा, ताकि इसे वहां मंजूरी मिल सके।
यह कैसी राजनीति है, झारखंड में आरक्षण बिल को राज्यपाल वापस कर देते हैं और कर्नाटक में राज्यपाल आरक्षण बिल को पास कर देते हैं।

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