दुमकाः लोकसभा चुनाव 2024 का झारखंड की उपराजधानी दुमका में राजनीतिक सियासी रंग चढ़ने लगा है। आजादी के बाद से ही दुमका लोकसभा सीट झारखंड की राजनीतिक का मुख्य केंद्र रहा है। बहुत ही कम लोगों को मालूम होगा कि लोकसभा के प्रथम चुनाव में दुमका दो सदस्यीय संताल परगना- सह-हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता था। उस समय इस सीट से दो सांसद चुने जाते थे। उस समय से राष्ट्रीय और सभी क्षेत्रीय दलों की निगाहें इस सीट पर विजय हासिल करने की रही है।पूर्व के चुनाव परिणामों के आधार पर चुनाव परिणामों पर गौर करें तो 1952 से लेकर 1980 तक इस क्षेत्र में कांग्रेस और झारखंड पार्टी के संस्थापक जयपाल सिंह के नेतृत्व में चलने वाली झारखंड पार्टी समेत अन्य झारखंड नामधारी दलों के बीच सीधा संघर्ष होता रहा है। 1990 के बाद राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव आया। तब से इस क्षेत्र में झामुमो व भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है। दुमका से झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन सबसे अधिक आठ बार सांसद चुने गये। इस बार पार्टी किन्हें मैदान में उतारेगी यह देखना दिलचस्प होगा। 1980 के बाद 1984, 1998 और 1999 के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो पिछले तीन दशक से इस सीट पर झामुमो अपनी तीर कमान को लहराता रहा है।हालांकि भाजपा चुनाव के तिथि की घोषणा के पूर्व ही अपने प्रत्याशी की सूची जारी कर चुनावी दौड़ में बढ़त बना लिया है। इस बीच भाजपा ने 24 मार्च को जारी नयी सूची में पूर्व घोषित प्रत्याशी निर्वतमान सांसद सुनील सोरेन का टिकट काट कर झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन की बड़ी पुत्र बधु सीता सोरेन को टिकट देकर चौंका दिया है। वहीं राज्य में सत्तारूढ़ और भाजपा का मुख्य प्रतिद्वंद्वी इंडिया गठबंधन अभी तक अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं कर पाया है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि झामुमो जेल में बंद पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अपनी पारम्परिक सीट दुमका से मैदान में उतार सकती है। इससे भाजपा चौकन्ना है और अपनी सीट को बचाये रखने के लिए एड़ी-चोटी एक कर रही है। प्रथम चुनाव से 1980 तक दुमका लोकसभा सीट पर जयपाल सिंह के नेतृत्व में संचालित झारखंड पार्टी और कांग्रेस के बीच टक्कर होती रही।15 नवम्बर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना और उस समय के दुमका के भाजपा सांसद बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। इस कारण 2002 में इस सीट पर उपचुनाव कराया गया। इस बार शिबू सोरेन फिर एक बार मैदान में उतरे। वहीं भाजपा ने बिहार के एक सेवानिवृत्त अधिकारी सोनेलाल हेम्ब्रम को अपना उम्मीदवार बनाया। जिन्हें शिबू सोरेन ने करीब डेढ़ लाख वोट से हराया फिर एक बार इस सीट पर झामुमो का परचम लहराया। 2004 में झामुमो के शिबू सोरेन के खिलाफ भाजपा ने कांग्रेस छोड़ पार्टी में शामिल हुए रमेश हेम्ब्रम को अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन भाजपा के रमेश भी पराजित हो गए। 2009 में भाजपा ने कभी शिबू सोरेन के खिलाफ उस समय के जामा के विधायक सुनील सोरेन को पहली बार मैदान में उतारा। झामुमो के चुनावी रणनीति का कभी हिस्सा रहे सुनील सोरेन ने शिबू सोरेन को कड़ी टक्कर दी। हालांकि सुनील सोरेन महज 15 हजार मतों के अंतर से चुनाव हार गए। 2014 में भी भाजपा ने दूसरी बार भी सुनील सोरेन पर ही दांव लगाया लेकिन इस चुनाव में भी उन्हें झामुमो के शिबू सोरेन से करीब 40 हजार वोटों के अंतर से मुंह की खानी पड़ी। 2019 में सम्पन्न चुनाव में भी भाजपा ने तीसरी बार सुनील सोरेन पर ही भरोसा किया जिस पर वे खरा उतरे। इस बार सुनील सोरेन ने अपने गुरु शिबू सोरेन को लगभग 47 हजार मतों के अंतर से हरा कर करीब दो दशक बाद एक बार फिर इस सीट पर भगवा ध्वज फहरा दिया।



