रांची :मंत्री इरफ़ान अंसारी ने रिम्स-2 के लिए आदिवासियों की जमीन हड़पने के लिए बाबूलाल मरांडी पर पलटवार किया है.मंत्री इरफ़ान अंसारी ने कहा है कि रिम्स-2 परियोजना को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी द्वारा लगाए गए आरोप “झूठ की राजनीति का झंडाबरदार” है। बाबूलाल मरांडी आज आदिवासी हितैषी बनने की नौटंकी कर रहे हैं, जबकि असलियत यह है कि उनसे बड़ा आदिवासी विरोधी कोई नहीं।“जब रघुवर दास की सरकार ने आदिवासियों की जमीन पर विधानसभा भवन और स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर उजाड़ने का काम किया, तब बाबूलाल मरांडी मौन क्यों थे? तब उनकी संवेदनशीलता कहां सोई थी? उस समय न तो उनके दिल में आदिवासियों की पीड़ा थी, न ही उन्हें संविधान की याद आई।”रिम्स-2 किसी भी आदिवासी या किसान की निजी खेती की ज़मीन पर नहीं बन रहा है, बल्कि यह पूरी तरह से राज्य सरकार की स्वामित्व वाली जमीन पर प्रस्तावित है। “झूठ फैलाना और लोगों को गुमराह करना भाजपा का पुराना हथकंडा है। बाबूलाल जी जानबूझकर आदिवासी समाज को भड़का करके सस्ती राजनीति करना चाहते हैं।”झारखंड की जनता जान चुकी है कि बाबूलाल मरांडी न तो स्थिर विचार के नेता हैं और न ही जनता के हितैषी। जब भाजपा में नहीं थे, तब खुद को सेकुलर कहते थे। आज भाजपा में हैं तो आदिवासी कार्ड खेलकर सिर्फ सियासी जमीन तलाश रहे हैं। जब रघुवर दास की सरकार में जामताड़ा में आदिवासी भूमि पर जबरन भाजपा कार्यालय का निर्माण किया गया, तब उन्होंने आदिवासी हितों पर चुप्पी साध ली थी।क्या वह आदिवासी ज़मीन नहीं थी? क्या उस समय संविधान नहीं था? उस समय उनकी आदिवासी संवेदना क्यों नहीं जागी?”रिम्स-2 परियोजना झारखंड की जनता का सपना है। एक ऐसा सपना, जो बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, अत्याधुनिक उपचार सुविधाओं और कमजोर वर्गों तक सुलभ इलाज की दिशा में ऐतिहासिक कदम है।रिम्स में इलाज के लिए राज्यभर से भारी संख्या में मरीज़ आते हैं। अस्पताल पर अत्यधिक दबाव है। रिम्स-2 के निर्माण से स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ बंटेगा और मरीजों को तत्काल व गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल सकेगा। यह फैसला पूरी तरह जनहित में है।“हेमंत सोरेन जी की सरकार यहां के आदिवासियों एवं मूलवासियों की सरकार है,भाजपा की तरह दलालों की नहीं, बल्कि जनता की सरकार है। यह सरकार झारखंड के हर वर्ग, हर जाति, हर धर्म को साथ लेकर चल रही है। यही समावेशी सोच भाजपा को खटक रही है।”“अगर वास्तव में बाबूलाल जी की राज्य के विकास में रुचि है तो रिम्स-2 जैसे जनकल्याणकारी परियोजनाओं का विरोध नहीं, समर्थन करें। लेकिन अफसोस है कि वे सिर्फ अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, जनता के हितों की नहीं। हम जनता से झूठ नहीं बोलते। रिम्स-2 आदिवासियों की जमीन पर नहीं बन रहा, यह सौ फीसदी सरकारी ज़मीन है। बाबूलाल जी को अगर हिम्मत है, तो तथ्य प्रस्तुत करें, वरना सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश बंद करें।




