सरहुल (खट्टी) आदिवासी सरना धर्मा का सबसे बड़ा त्योहार है। इसे धरती पूजा (खेल) कहते है। चैत शुक्ल पक्ष तृतीया को धरती माँ और सूर्य का विवाह किया जाता है। इसलिए सरहुल पूजा को प्रकृति का महापर्व कहा जाता है। झारखण्ड का सांस्कृतिक महापर्व है- सरहुल प्रकृति, संस्कृति एवं अस्तित्व का रक्षाबोध कराता है एक ऐसा है जिस दिन उमंग और उल्लास की अभिव्यक्ति के लिए सारा आदिवासी समाज एकजुट हो जाता है बच्चे पतियाँ सभी संकर प्रकृति की आराधना करते हैं। आदिवासी जीवन के लप को समझना हो तो सरहुल पर्व को देखा जा सकता है। इस स्वोहार में माँ सपना धर्मेश की पूजा होती है। सरना मी धरती माँ आदि शक्ति है। सरना भी धरती पर इसके अनेक रूप । यह जगत में शक्ति की धर्मेश ही है अपनी शक्ति सूर्य और धरती के माध्यम से प्रदर्शन करती है। सूर्य महान शक्ति धर्मेश और धरती भी सूर्य दोनों को मिश्रित शक्ति से मनुष्यों, जीव जन्तुओं, कीड़े-मकोड़ों, पेड़-पौधों, घास-फूसों तथा चराचर जीवों का सृजन होता है। इसका प्रमाण है पेड़-पौधे सूर्य की ओर झुक जाते मैं इसीलिए प्रकृति पुत्र इनकी महिमा को कायम रखने के लिए सूर्य और धरती की शादी सरल के अपर रचाते हैं। इस पर्व में मुख्य रूप से धरती मी एवं सूर्य का बंधन बांधा जाता है। प्रतीक के रूप में महान एवं पहनाईन को मानते मैं सरहुल के पहले सरना धर्मा धरती माँ को कुंवारी अविवाहित मानते हैं। इसी कारण सरहुल पूजा के पहले कोई भी न फूल फल नहीं खाते है।
सरहुल पूजा में ही धरती सरना माँ और सूर्यः धर्मेश के साथ पुस्खों के नाम से भी चढ़ावा चढ़ाया जाता है। परम्परा के अनुसार वैवाहिक संस्कार की रस्म पूरी होने के पश्चात् ही प्रजनन क्रिया होती है प्रकार धरती माता जो सभी धारियों को जननी है, इसका हर वर्ष एक सम के अनुसार वैवाहिक संस्कार किया जाता है। यह संस्कार है- सरल पूजा। इसके बाद ही वंश बढ़ता है। कहने का मतलब है कि धरती में नये बीज लगते है, इसके बाद ही नये फल-फूल, साग-पो का सेवन किया जाता है। यह विचार हमारे आदिवासी पुरखों का था जो आज भी मौजूद है तथा यह कार्यक्रम सदियों से चला आ रहा है। सरहुल पूजा की तैयारी तो महीने भर पहले ही शुरू हो जाती है। घर की साफ सफाई के साथ पाई-पुताई भी करते है। नये बेटी-दामाद को भी बुलाया जाता है। दूसरे दिन समधी समधों को भी सुलाने की पर है। इस पर्व के खाने में जन इसकी जो रद करा की तरह ही बनता है। इसके अलावे आज के परिवेश में अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं
पहान गाँव के लोगों के लिए सामूहिक पूजा करता है और हरेक घर के का भी अपने-अपने घरों में सरना माँ की पूजा- पाठ करते है। सभी घरों में पूर्वजों को कुल पहान गाँव के लोगों के लिए सामूहिक पूजा करता है और हरेक घर के का भी अपने-अपने घरो में सरना माँ की पूजा-पाठ करते है। सभी घरों में पूर्वजों की कुल देवता मान कर इस अवसर पर उन्हें याद करते हैं। इसलिए पुजारियों को भी नया फलफुल खाना मना है। जिस गाँव के लोग सरहुल के पहले फागुन में गाँव को डाड़ी में साजे-बाजे सभी सरल राग में होते हैं। जब बसंत ऋतु आती हैं तब सभी पेड़- नहीं हुए गाँवों के लोगो दोषीदार होते हैं। पौधे नयी परियों के साथ रंग-बिरंगे मनमोहक फूलों से सजाते है उस समय घर में स्किन के समान सज जाती है। सबुत पूजा में सतुआ के फूल को मतिमा इन गानों के द्वारा झारखण्ड में गुमान सरहुल फूल डाल देते है उस गाँव के लोग सरहुल देवता मान कर इस अवसर पर उन्हें बाद करते हैं। इसलिए पुजारियों को भी नया फलफुल खाना मना है। जिस गाँव के लोग सरल के पहले फागुन में गाँव को डाड़ी होती है। में सरगुल फूल डाल देते है उस गाँव के लोग सरल नहीं हुए गाँवों के लोगों दोषीदार होते हैं। सरल हुए गाँव के लोगों लागढ़ी मे खान-पान करने को पूर्व में मतत्याने अनुसार असून, पेपी और कलंकित व्यक्ति के समान मानते है 2 की भाषा में इसे सराहना करते इस गाने में बंसत में धरती की चैत महीने में धरती पर विविध प्रकार के पेड़-पौधे, जब नयी पीयों और नाना प्रकार के सुगन्धित फूलों से जाते हैं। तब ऐसे अवसर पर प्रकृति पुत्रों की उमंगे बड़ जाती है। उनसे प्रभावित एवं उत्साहित होने से उनके पैरों में एक प्रकार की गति आ जाती है वे नाचने-गाने के लिए बेचैन हो उठते हैं। सभी लोग पर्व की तैयारी में जुट जाते है। फगुवा बीतने के बाद युवक-युवतियों के मन में सरगुत मानने की उमंग आ जाती है के स्पोहार मानने के लिए व्याकुल हो उठते है उनकी का अंदाज इससे है।पतझड़ के बाद जैसे नी हरी-भरी परियों और रंग-बिरंगे फूलों के साथ अपने नवजीवन में प्रवेश करते है, पैसेही प्रकृति पुत्र उरांव, सरना, माँ धरती माँ की पूजा कर नये उमंग के साथ जीवन का शुभारम्भ करते हैं। ये अपने दैनिक जीवन को प्रकृति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। प्रकृति के वातारण में मिल जाते है। गोविन्द राग और एन्टेर पूपन मेारकी अभंग? भाग जोगनी लेखा सरकारकी बरा और न मेरी अग भागनीगनी लेखा सवकारको बरा है। इससे संबंधित गाना इस प्रकार है- सुन्दरता का वचन है। चारों दिशाओं में सुगंधित फूलों की खुशबू फैलने लगती है। फूलों की खुशबू से धरती का वातावरण कुल्ली अम्बा कला या कुलीनैगम उद्दारी केरस खुदी चन्द अम्बा कला या मह-यह महक उठता है।



