जीने की आस अस्पताल जाते ही समाप्त

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जीने की आस में अपने ले जाते हैं इलाज के लिए परिजनो को अस्पतालों में एसा ही एक मामला हजारीबग के खिरगौव का है जो पिता की तबीयत खराब हो ने पर यहां कई जगहों पर दौड़ लगाई कोई एडमिट कर ले पर कुछ देर के लिए पनाह भी दी तो हजारों लेकर चलता कर दिया एक जगह पे तो रुपये ले कर जांच रिपोर्ट कोरोना में निगेटिव आया लेकिन भरती नही लिया और रेफर भी रांची में कर दिया जहां दर बदर देर भटकते रहे पहले वहां रिम्स गए नहीं लिया मेडिका गए एक दिन में लाख रुपए बिल और स्तिथि में सुधार नहीं तो फिर वो लोग पारस मेडिकल भरती किये जहां काफी रुपए लेने के बाद मृत धोषित कर दिये गए और जब लाश मांगा तो देने से मना कर दिया और बोला गया आप लोग चले जाएं इसे ढेकाने लगा दिया जाए गा बहुत रोने पीटने चिलाने पर भी नहीं दिया हार लाश को छोड़ तीन रोज बाद अपने घर चले आये वहां रिम्स के द्वारा उन्हें सुपुर्द खाक कबरिसतान किसी जगह कर दिया जाए गा उनकी मौत गुरुवार रात हो गई थी आज इनके घर पे अंतिम कार्य चल रहा था छढे़ रोज अचानक सदर अणुमंडल कार्यालय से फोन आता है कि आप के घर से जो डेथ किये थे उनका बौडी आ रहा आप रिति के अनुसार उनहे दफन कर दें जिला अध्यक्ष सह समाज सेवी स शांति समिति सदस्य संजर मलिक ने सवाल उठाते हुए यह कहा कि क्या अब मानवता संवेदना शून्य हो चुके हैं जस्टिस सिस्टम से कैसे मिलेगा जब सरकार हर संभव उपाय कर रही फिर भी इतनी बडी चूक मरे हुए बुजुर्ग के साथ यह भद्दा खिलवाड़ सहन करने योग नहीं शर्म की सारी हदें पार इंसानियत भाईचारगी सद्भाव यह सब कालपनिक के रुप में दिखाई पड़ रहा कौन देगा यह वो जवाब ?

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